मन ही मन खुद के मैं आज खुदसे ह
इस ज़ालिम ज़माने से लड़ते-लड़ते, इस सफर में मिला कोई अपना सा, औरों के ज़ख्मों पर मरहम लगाते लगाते, मेरे खुद के ज़ख्मों पर वो लगा मरहम सा, इस सफर में खो कर वो हमसफ़र अपना, बन कर अपनी ढाल वो लड़ती गई, उसके हार की आस में ऐसी कितनी ही निगाहें, जो अपने ही नज़रों से गिरती गई मगर, थाम कर दामन अपने अकेलेपन का, खुद को उसने क्या खूब तराशा है, क्यों ना मिला मैं उस हमनवा से पहले कभी, तकलीफ़ ज़रा सी मेरे मन में आज अफसोस ज़रा सा है, मन ही मन खुद के मैं आज खुदसे ही कहता गया, क्यों ना तलाशा तुझे मैंने पहले कभी, तेरी इस खूबसूरती से अंजान तेरी सादगी से जुदा, मन ही मन खुद के मैं आज खुदसे ही कहता गया... ©अल्पदेव
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