बचपन/संघर्ष
जिंदगी तेरे भी किरदार बड़े निराले हैं, कभी दो पल की खुशी तो कभी गम के बादल काले हैं.. बच्चे थे जब था उमंग सब आसान सा लगता था, रोते थे तो माँ का आंचल जन्नत सा जहां लगता था.. अब तो ना मैं छोटा हूं ना आसान कुछ लगता है, संघर्षों की राह है सब आसमान सा लगता है.. मन करता है फिर छिप जाऊं रो कर मां के आंचल में, काश वो बचपन जी लूं फिर से चंद पहर कुछ पल में.. जाऊं भी तो कहां जाऊं बस चारो तरफ अंधियारा है, किस्से कहेंगे हाल अपना भला कौन अब हमारा है.. सावन की बरसात हो या तपती जेठ की गर्मी, आंचल की वो हवा कहां अब कहां वो हमदर्दी.. आखिर इन राहों पर भी तो चलते हम मतवाले हैं, जो चले गए उस पार शायद वो ही किस्मत वाले हैं..!!
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