मेरी तरफ़ से आज नकद और कल उधार
रोती है बुलबुल चाँदनी को कि खा गई रात उसके हिस्से की चाँद को वो कोसती है अपनी क़िस्मत को तो कभी देती आवाज़ मुझको है मैं तीरगी का हूँ शैदाई अपनी जेब में रात को लिए फिरता हूँ यूं तो बहुत हसीन है आँखें मगर नज़रें शदीद कमज़ोर है उसकी वो दूर देखने की ज़िद में है मगर पास वाली नज़र कमज़ोर है उसकी हारी हुई बाज़ी का मलाल नहीं मगर जीती हुई का सॊग़ है उसको किसी कल का इंतज़ार है उसको मेरी तरफ़ से आज नकद और कल उधार है उसको
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