पल
मंजिल का मेरा ठिकाना न रहा, ठहर जाने का कोई बसेरा न मिला। चलने आये थे जिन राहोपर, इन राहोने मुझे अपना ना कहा। खुशीया मैंने थोड़ी समेटी थी, एक आधी चली, खुशीया गई मिटी के अदर।
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