प्रेम से प्रेम
अब किसी चेहरे की चाहत नहीं रही, न ही किसी नाम की तलब बाकी है। मैंने ख़ुद को उस एहसास में घोल दिया है, जिसमें रूह की हर प्यास बाकी है। मुझे प्रेम से प्रेम हो चला है। न पाने की ज़िद है, न खोने का डर, न किसी मोड़ पर रुकने का सफ़र। मैं तो उस लौ का मुसाफ़िर हूँ अब, जो जलती है खुद में, बे-ख़बर। वही इबादत, वही आयत, वही इल्म है, वही सुकून, वही जुनून, वही नज़्म है। दुनिया ढूँढती रही महबूब गलियों में, मेरे भीतर अब प्रेम का ही संगम है। हाँ, मुझे अब प्रेम से ही प्रेम हो चला है।
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