बेचैनी
बितता जा रहा दिन महीने साल कम होता जा रहा अब आरक्षित साँस उम्र अब ढलान पर फिसलता जा रहा पर जीवन का क्या है क्यों रुका जा रहा। बस वही दिनचर्या वही चुनौती वही संघर्ष कुछ नए की तलाश में मन क्यों उलझता जा रहा पर नया क्या ? क्या कमी है? क्या चाहिए मुझे? ऐसे उलझे सवाल क्यों हमेशा पीछा कर रहा। कुछ तो छुट रहा है अन्दर ही अन्दर घुट रहा है कुछ अटका जरूर है जो मुझे परेशान कर रहा। कैसा जीवन चाहिए था कैसा जी रहा हूँ मैं मोह के बंधनों में हर रोज अब कसता जा रहा हूं मैं ।
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