सफर...
सफर... जब कोई साथ न हो, तो रास्ते अजनबी नहीं, पर कुछ अधूरे से लगते हैं। जैसे मन कोई शून्य ढो रहा हो — कोई याद, कोई अहसास जो छूट गया हो कहीं। कभी लगता है जैसे कुछ बहुत अपना बिछड़ गया है, और मैं उसी को ढूंढने निकला हूँ इन असीम राहों पर... पर तभी, एक कठोर सा विचार मन में दस्तक देता है — शायद यही अच्छा है… न कोई साथ है, न कोई रोक, न कोई टोका। न किसी के खोने का दुःख, न किसी के आने की उम्मीद। न किसी को मन की बात समझाने का बोझ, न खुद को साबित करने की जद्दोजहद। मैं अकेला हूँ… पर शायद पहली बार सच में आज़ाद हूँ। जहां चाहूं, जा सकता हूँ। जैसा चाहूं, जी सकता हूँ। न रिश्तों की ज़ंजीर, न सामाजिक मुखौटे। बस मैं हूँ, और मेरा सफर... एक अनंत, उन्मुक्त यात्रा… खुद तक.....
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