फिर भी
तू क्या ही मुझ पर गुरूर करेगा, मैं खुद ही खुद को धिक्कारती हूँ। तू क्या ही मुझमें सुकून पाएगा, मैं खुद ही खुद को निराशा में ताकती हूँ। ना कुछ किया, ना ही कुछ कर पाऊँगी, फिर भी तू मुझ पर इतना भरोसा क्यों करता है? तेरे विश्वास को झूठा करना, इतना दर्द क्यों देता है? लोग हँसते हैं मुझ पर, कहते हैं तू कुछ नहीं कर पाएगी, अब तो खुद पर भी मेरा भरोसा नहीं रहा। फिर भी तेरी आँखों में इतनी उजली, मेरे अधूरे सपनों को लेकर क्यों?
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
