विधाता छंद
प्रणय के गीत गाते हैं। कदम तरु पर कन्हैया जी, प्रणय के गीत गाते हैं। मधुर सुर छेड़ते मानो, प्रिया को वे बुलाते हैं।। चली आती तभी सुन धुन,किशोरी दौड़ तरु नीचे। पुनीता खो रही सुध बुध, बहाये नीर भू सींचे।। जमा होने लगे खग मृग,वहाँ पर देखने लीला। सभी हो मस्त मृदु ध्वनि सुन, गला रुंधा नयन गीला।। गजब की प्रीति थी जिनकी, कहे जन-जन जिसे न्यारा। लिखूँ उस प्रीत को कैसे, जिसे पूजे जगत सारा।। नरेन्द्र सिंह,अतरी, 09.04..2025
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