विधाता छंद:नरेन्द्र सिंह
तुम्हारी याद आती है निकलता हूँ कहीं बाहर, तुम्हारी याद आती है। तुम्हारे हाथ की जादू, कहाँ अब वह चपाती है।। गई जबसे त्याग कर माँ, नहीं भर पेट खाया हूँ। बहुत दिन हो गये पर क्या, कभी मैं चैन पाया हूँ।। अगर माँ पास तो समझो , जगत में भाग्यशाली हो। बिना माँ जिंदगी कैसी, लगे संसार खाली हो।। बने दुश्मन यदि सारे, प्रसू ही साथ देती है। टिका है स्वार्थ पर जग यह,जहाँ माँ कुछ न लेती है।। 08.04.2025
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