एक कमरा – दो दुनिया
एक कमरा – दो दुनिया घर में माँ के हाथों की खुशबू, दाल में छौंक, और चूल्हे की धुन, पीतल की थाली में सजी रोटी, वो प्यार से भरी हर एक गुनगुन। "बेटा, गरम है खा ले जल्दी," ये शब्द थे जैसे जीवन की सरगम, हर निवाले में था अपनापन, हर स्वाद में था उसका संकल्प। फिर आया शहर, एक किराये का कमरा, गैस पर उबला मैगी का पैमाना, एल्युमिनियम के बर्तन, प्लास्टिक की चम्मच, ना माँ की आवाज़, ना रोटी का ठिकाना। यहाँ खाना सिर्फ पेट भरता है, वहाँ खाना दिल को छू जाता था। यहाँ सन्नाटा है खाने की मेज़ पर, वहाँ हँसी थी, कहानियाँ थीं, माँ की सज़ा भी मिठास थी। कभी-कभी लगता है थाली नहीं, पूरी ज़िंदगी बदल गई है, एक कमरे से दूसरे कमरे तक, सिर्फ खाने का नहीं, जिंदगी का स्वाद भी खो गया है।
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