प्रेम
मै जटाधारी शंकर तो नहीं पर......... तुम प्रेम की मूरत पार्वती प्रिए मैं अपने लफ्जों से बयां न कर पाऊं तुम वह मूरत प्रिए तेरे ख्वाबों को दिल में छुपा लूं वह बहुमूल्य रत्न प्रिए तेरी मुस्कान से मेरे दिल में उजियारा हो जाए वह सूर्य की पहली किरण प्रिए तुम्हें पलकों में बसा लूं वह सपने प्रिए तेरी आंखें गंगा की धारा प्रिए मैं उसमें डुबकी लगाने वाला साधक प्रिए मै भागीरथी की छोटी धारा तुम तेज़ प्रताप में बहने वाली अलकनंदा प्रिए तेरी धारा को जहां अपने में मिला लूँ वो देवप्रयाग प्रिए जन्मों जन्मों तक तेरा साथ न छूटे वो शंकर और पार्वती प्रिए तुम गंगा और मैं यमुना की धारा तुम मुझे स्वीकार करो वो प्रयाग का संगम प्रिए
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