प्रयागराज और वो
मैं इलाहाबाद में हूं पर मैं हूं नहीं इलाहाबाद मे दिल तेरी यादें लिए तेरी गलियों में घूम रहा है दिमाग तुझे लाने के प्रयत्नों में खोया सा है आंखें तेरी एक झलक पाने को बेकरार हैं और लोग कहते हैं तू तो इलाहाबाद में है फिर भी लोग कहते है तू खोया सा है तू खोया सा है गंगा की मंद लहरों में यमुना की तेज़ धार में तू उसे निहार रहा और संगम की बात क्या करे और.. संगम की बात क्या करे जैसे सरस्वती की धारा को मिलते किसी ने देखा नहीं वैसे मेरे इस बेस्वार्थ प्रेम को उसने खिलते देखा नहीं और फिर मैं कहता हूं मैं इलाहाबाद में हूं पर मैं हूं नहीं इलाहाबाद मे गंगा जैसी प्रेम मधुर सी बहने वाली उसकी मुस्कान यमुना की तेज़ प्रवाह सा गुस्सा है और दोनो के संगम जैसा प्यार छुपाए रखती हैं और फिर भी कहती है प्यार नहीं वो दोस्त बनाए रखती हैं वो दोस्त बनाए रखती हैं मैं उसे जीवन संगनी इन्हीं ख्वाबों को लिए मैं दिन भर बुनाई करता हूं और फिर मैं कहता हूं मैं इलाहाबाद में हूं पर मैं हूं नहीं इलाहाबाद मे शशांक बाजपेई
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