जीवन का सार हो तुम
मैं अपने मौज जब रास्ते से निकला तो एक मंजर देख ठिठुर गया जैसे पवन की वेग मुझमें समा गई हो आकाश की बिजली ने मुझे जला दिया हो यह मंजर नहीं मेरी मौत का दास्तां लिखा जा रहा था बस फर्क इतना था कि इस मंजर को देखने को जलजला उमड़ा था मेरी लिए ये खून की होली थी लेकिन प्रियतम के लिए.......... उस दिन वो उसके माथे की रोली थी ख्वाबों के बाग में फूल का जस्ता मैने लगाया था बस फर्क इतना था कि माली कोई और बन बैठा था ख्वाबों की होड में एक ख्वाब मेरा भी था अपने घर से तेरे घर बारात मै भी लाऊ बारात तो उठी है मेरे घर से ये प्रियतम फर्क इतना था कि ये तेरे घर नहीं शमशान की ओर जा रही थी जलजला तब भी उमड़ा था जलजला अब भी उमड़ा है लोग उस समय भी रो रहे थे और लोग इस समय भी रो रहे हैं फर्क इतना है कि तुम अपने घर जा रही थी मैं अपने घर से जा रहा था हे प्रियतम मन में तो ख्वाब बहुत बस कहने वाला शेष नहीं है प्रेम रहा हो तेरे मन में तो अब समझ तो लेना इन ख्वाबों को क्योंकि अब समझाने वाला शेष नहीं हे प्रियतम...... अगर समझ गई इन ख्वाबों को तो आकर मुझको देख जरा देख नहीं सकता मै तुझको तुमने कर दी देर बहुत आना प्रियवर माथे को ढक कर अब रूह नहीं देख सकती इस मंजर को देख नहीं सकता हूँ मै तुझको तुमने कर दी देर बहुत को शशांक बाजपेई
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