ऊँचाईयाँ
चल रही हैं ऊँची प्रतियोगिताएँ , निज सर्वोच्च साबित करने की । चाहे कुछ भी करना पड़े मुझको , चाहे बारी आ जाए मरने की ।। बातों से ही केवल ऊँचा बनते । कर्म नहीं कोई भी ठिकाने की । कर्म में आगे की आती है बारी , पुनः सोचते वापस ही आने की ।। बहाने बनते तब वहाँ कोई भी , वापसी हेतु अपनाते कोई विधा । बातों से तो वे ऐसे ही हैं लगते , बातों में ही हैं वे तो स्वयंसिद्धा ।। सीख लें हम राष्ट्र प्रहरियों से ही , जो नहीं किसी से कभी डरते हैं । करते अरियों से डट मुकाबला , या तो वे मारते या स्वयं मरते हैं ।। सीख लें हम उच्च हिमालय से , जो स्वयं अंबर को छू लेता है । आँधी तूफाँ में भी अटल रहता , कर्म में वापसी क्यों तू होता है ।। हिमालय कभी परिचय नहीं देता , मैं दुनियाँ में सबसे ही ऊँचा हूँ । हिमालय न कहता मैं अंबर छूता , बस तुच्छ बनने की न सोचा हूँ ।। छू सकें तो छू लें शीर्ष शिखर को , निज कर्मों से ही उच्च होकर । हर ऊँचाईयाँ तब कदम चूमेगी , तब आ नहीं सकता कोई ठोकर।।
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