आजादी की सीमा
मुफ्त में मिली आजादी की कीमत शायद लगा न पाओ, पूछती हु प्रश्न, आजादी की सीमा का शायद बता न पाओ चुभने वाली बात है कड़वी है मगर सच है .... सड़कों पर निकलने में आज भी क्यों हिचक है.... जब सीमा की आए तो न जाने कैसे नियम बनाते है ... लड़कों को घूमने छोड़ लड़कियों को घर बैठाते है.... अनजाने में कही गलत न हो जाए, चाहे वो वातावरण आप स्वयं ही क्यों न बनाए ईश्वर ने तो नहीं बनाए , बंदिशों के नियम न जाने कहां से आते है खुद की सोच गलत लिए जो समाज बदलना चाहते है सोच छोटी लिए होते है , लेकिन प्रश्न कपड़ों पर उठाते हैं नर नारी तो भगवान की कृतियां है , इनमें कैसा फर्क है , बलात्कार, हिंसा जो जीते जी नर्क है , शायद किसी और ने लिख दिए होंगे ऐसे नियम, लेकिन, खुली हवा में सांस लेना तो सभी का हक है समाज में मर्यादा का हिसाब जो बेटियों से लगाते है , न्याय मिले , न मिले , लेकिन मोमबत्तियां जलाकर जरूर बैठ जाते है कहते हो , पुरखों की कुर्बानी से देश आजाद हो गया , पूछो जरा प्रश्न लड़कियों से , की आजादी का मतलब कहां खो गया !
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