उसकी मुस्कान
वो शान्त धीर बिल्कुल शिथिर में छोटी सी मुस्कान लाती हैं जैसे मौसम में पछुवा हवा और समुद्र में तूफान फैला जाती है उसकी ये हंसी, हंसी नहीं पजल सी लग जाती है जिसे सुलझाने का नहीं उसमें खो जाने का उत्साह पैदा कर जाती है ये मंद ब्यार में पछुवा की मार जैसी हंसी कभी कभी आती है और जब आती है..... तो प्रियवर कितनो को घायल कर जाती है प्रियवर तुम कहती हो मेरी हंसी में है क्या अपनी पास रखा हीरा सभी को मोटी सा लगता है तुम रात में हंस कर तो देखो दिन जैसा आलम छा जाता है वो तुम्हारी हंसी जब जब मुझे याद आती हैं मन में कितना भी रोष हो खुशी में बदल जाती हैं हां आता है तुम्हे गुस्सा बड़ा पर जल्द शांत हो जाती हो तुम्हारे व्यक्तित्व की बात क्या करूं जैसे समुद्र की लहरे गिनी नहीं जा सकती हैं आकाश की बिजली का तेज़ मापा नही जा सकता है सरस्वती नदी को दोबारा देखा नहीं जा सकता है वैसे तुम्हारे व्यक्तित्व की गणना करना मेरे क्या आर्य भट्ट जी के बस के बाहर हो जाता है ऐसा व्यक्तित्व पार्वती के बाद तुम्हारा ही है प्रिए, यह भोले कह जाते हैं पार्वती का स्वरूप के लिए तुम्ही प्रिए ,ये ब्रह्म कह जाते हैं तुम्हारे व्यक्तित्व की बात कर पाना इस जन्म में संभव नहीं प्रिए संभव नहीं प्रिए ।। शशांक बाजपेई।।
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