"गरिमा"
जीवन की गरिमा को क्षिप्त विक्षिप्त होते देखा मैंने कुछ इंसान किसी सफर पे थे शायद थोड़ा सुख खोजने निकले थे अपनी कराह से परेशान होकर इंसान प्रकृति की सबसे रचनात्मक कृति है तो बिना कुछ हुए कोई इंसान कहां रह सकता है उनमें भी कोई डॉक्टर रहा होगा, कोई इंजीनियर, कोई कुछ और सपने, रंगीनियां सबकी आंखों में होगी मन का संसार सबका बड़ा विशाल होगा राग द्वेष, अहंकार, प्रेम, स्पर्धा और न जाने किन किन भावनाओं से ओत प्रोत होगा उनका मन मगर दुर्भाग्य से उन मनुष्यों के पास भी हाड़, मांस का एक ढांचा ही था जो नहीं सहन कर पाया भीषण प्रलयकारी चोट और छिन्न भिन्न होकर बिखर गए उनके अंग शरीर से निकलकर बस इतना सा मोल था उनके जीवन का प्रकृति के लिए इंसान, जिसका अहंकार कई ब्रह्मांडों में नहीं समाता समय की गोद में काल के ग्रास के अलावा और क्या है ?
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