हवस
हवस ==================== मानाकी तुम्हरे संस्कारै मे कमी है, तुम्हारी संगत भी बे गुनी है, भुलकर तुम्हे भगवान ने, ईंन्सान बनाया है. वरना तुम तो ईन्सांन की शक्ल मे, भेडीयेसे भी बत्तर हो, हवस का खेल जो तुम खेलते हो, क्या तुम कोई नाजायजसी, कोई आवलाद हो. क्या कोई नपुसक, जो सिर्फ मासुमीयत को ही कुचल शकता, कीसी और को नही. हावस के पुजारी, सामना हुवा कभी मर्द से तो, पता चलेगा तुम्हे की तुम क्या हो. माॅं कसम....., जींदा ही होंगे तुम, लेकीन....., दो गज जमीन के नीचे, दो गज जमीन के नीचे. ================
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
