रसिक
तुम बढ़ रहे हो मृत्यु की ओर सतत्, हर पल मगर तुम मान बैठे हो कि तुम्हारे आंगन के घड़े में पानी नहीं अमृत है तुम झेल रहे हो बोझिल वर्तमान.. इस आशा में हो कि होगा कुछ बेहतर.. और बेहतर कामना के पर्दे के उस पार भविष्य के गर्भ में, तुम देख नहीं पाते इस शरीर का एकदम ज़ार - ज़ार हो जाना तुम देख नहीं पाते तुम्हारी हस्ती का तार - तार हो जाना... माया के जादू को सच मान बैठे हो कि ये संसार तुम्हे तृप्त कर ही देगा एक दिन कि हासिल कर लोगे वो आखिरी मुकाम जिसे गढ़ा भी तुमने ही है अपनी कहानियों में... मगर भीतर कहीं तुम जानते हो कि आज तक जो भी पाया तुमने कहां मिटा पाया वो बेचैनी तुम्हारी... डरे रहते हो हर वक्त कभी पत्तों की खड़खड़ाहट से कभी किसी अनहोनी की आहट से... मगर जीवन का बर्बाद चले जाना तुम्हे डरा नहीं पाता कितने वीर हो तुम वाकई ! हे l संसार के रसिक तुम्हे शत्-शत् नमन lll
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
