"तुम्हीं से "
उदयाचल की भोर सुहानी, ढलती सुनहरी शाम तुम्हीं से। रीते नयनों के स्वप्न सलोने, सिक्त हृदय का स्पन्दन तुम्हीं से । तुम साहिल सागर के मैं उफनती लहरों सी , प्यासी लहरों की लिपटन तुम्हीं से। इस जीवन में नव रंग, ये रंगीनियाँ, और नख शिख का शृंगार तुम्हीं से । मैं रवि -सा तेजस लिए शशि -सा शीतल पाश तुम्हीं से। । मैं ना होती, ना अस्तित्व होता तुम मिले इस अस्तित्व की पहचान तुम्हीं से। । ✍️ नारायणी
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