अंदाज उनका
अल्फाज ए इश्क भी, भुलाएं नहीं है जाते, दर्द ए दिल भी अब, सहे नही है जाते.. शुक्रिया करूं तो, करूं उनका कैसे..., खुले जुबां जिक्र हमारे अब, लिए नही है जाते ! अंदाज उनका तो, अलग ही बहुत है... फिक्र हमारी दिलसे, छुपा भी न पाते... कह तो गई थी, की 'दोजख' में जाओ.. !! पल भर में नजर, ढूंढती नजर क्यों आएं ? क्या चाहती है? हम ना समझे कसम से कसम टूट गई है, बात उतरी उनके 'इल्म' से । मुहब्बत को "जिंदगी," नाम उन्ही ने दिया था , भुलाकर भी खुश, जी रही है वो कैसे ?? क़ाफिया मेरे दिल का, गुनगुनाती अदब से, "अज़ाब" वो जिया की, 'अता' करती नहीं है । (क़ाफिया = तुक, अंत्यानुप्रास ) (अज़ाब = पीड़ा, सन्ताप ) (अता = देना ) ©®@devideep3612
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