अमर है आत्मा
यहाँ प्रस्तुत है — "अमर है आत्मा" – विस्तृत संस्करण ✍ विजय शर्मा एरी ना जन्म से बंधी है, ना मृत्यु से डरती है, ना समय के बंधन में, ना काया से जुड़ती है। वो साक्षी है युगों की, वो गवाह है काल की, हर प्रलय के बाद भी, चमकती है ज्योति माल की। शरीर बदलते हैं जैसे ऋतुओं का आना-जाना, पर आत्मा रहती है सदा, जैसे अंबर का ठिकाना। ना उसे जला सकती अग्नि, ना काट सकता कोई शस्त्र, वो अदृश्य, अविनाशी, अनादि, अजर-अमित है नित्य। राजा हो या रंक, सभी को त्यागना है देह, पर आत्मा का गीत अमर है, सृष्टि का यही स्नेह। कभी माँ की ममता बनकर, कभी पिता का अनुशासन, कभी प्रेमिका की चाहत, कभी सखा का विश्वास बन। धूल में मिल जाते महल, मिट्टी हो जाते ताज, पर आत्मा की यात्रा में, नहीं होता कोई विराम आज। हर जन्म में नया शरीर, नया घर, नया ठिकाना, पर अंतहीन है यात्रा, है यह परम ज्ञान का खज़ाना। इसलिए न रो जब कोई शरीर को छोड़ चला जाए, वो आत्मा तो बस अगले सफ़र पर निकल जाए। याद रखो, जो तुम हो, वह यह तन नहीं, तुम हो वो शाश्वत ज्योति, जो कभी खत्म नहीं।
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