शिव
नीले गगन के पार, हिमालय में बसी है, भगवान शिव की महिमा, जो अनंत है, वही है। त्रिशूल धारी, जटाधारी, गंगा धारक, शिव के चरणों में, संसार सारा नमन है। डमरू की ध्वनि में, अनहद नाद गूंजे, महाकाल के मंदिर में, भक्ति की धारा बहती है। त्रिनेत्र की ज्वाला में, सभी कष्ट जलते हैं, शिव की कृपा से, जीवन के पथ पर हम चलते हैं। शिवलिंग की पूजा में, समर्पण की भावना, भस्म रमाए तन पर, बैरागी का यह रूप है। आदि योगी, ध्यान की मुद्रा में विराजे, शिव के ध्यान में ही, सच्चा आनंद है साकार। अर्धनारीश्वर का यह रूप अद्वितीय है, शिव और शक्ति की मूरत में, प्रेम की पराकाष्ठा है। नागराज गले में, चंद्रमा मस्तक पर, शिव के वचन में ही, जीवन का हर प्रश्न हल है। शिव की महिमा अपार, शब्दों में नहीं बंधती, हर हर महादेव का जयकार, सृष्टि में गूंजता है। भक्ति के सुरों में, शिव का गुणगान करें, शिव की आराधना से, जीवन को आलोकित करें।
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