मेरे पापा
खुद का ना किया परवाह कभी, बस अपना फर्ज निभाया है, दिन हो चाहे रात केवल अपना धर्म निभाया है, थक जाने की बात कहां जिम्मेदारी ने घेरा है, तकलीफ भला कैसे होने दूं आखिर परिवार तो मेरा है, आंसू भी आ जाए तो पोंछ उसे मुस्काते हैं, अपनी तकलीफों को भला कहां कभी कह पाते हैं, खुद की शर्ट फटी हो लेकिन मेरे लव पे मुस्कान रहे, खुद के जूते में हो टांके पर दिल में अरमान रहे, आखिर ये बच्चे मेरे कुछ बन कर दिखलाएंगे, कब आएंगे वो दिन जब हम भी खुल कर मुशकाएंगे, बच्चो की खुशियों की खातिर खुद को खूब तपाते हैं, अपनी उन्हें परवाह नहीं परिवार की खुशियां लाते हैं, जीवन के लंबे रस्ते को जिसने मेहनत से नापा है, आदर्श कहूं या प्रेरणा केवल मेरे पापा हैं..!!
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