साथ होना प्रेम से बड़ा है
उसने पूछा, "क्या तुम प्रेम में हो?" मैंने मुस्कुराकर बस इतना कहा, "मैं तुम्हारे साथ हूँ।" प्रेम तो अक्सर लहरों जैसा होता है, जो कभी किनारों पर होता है, तो कभी वही से लौट जाता है। प्रेम कभी शब्दों के जाल में खो जाता है, तो कभी अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाता है। पर साथ होना... साथ होना एक थकी हुई शाम का सुकून है, यह बिना कहे सब समझ लेने का जूनून है। प्रेम में शायद हम एक-दूसरे को ढूंढ़ते हैं, पर साथ होने में हम एक-दूसरे को थाम लेते हैं। क्यों जरूरी है साथ होना? जब शब्द खत्म हो जाएं, तब भी जो पास खड़ा रहे, वही साथ है। उजालों में तो परछाइयां भी प्रेम करती हैं, पर अंधेरों में जो हाथ न छूटे, वही साथ है। प्रेम अक्सर भागता है पाने के लिए, साथ होना ठहर जाता है निभाने के लिए। इसलिए, प्रेम में होना शायद शुरुआत है, पर साथ होना उस सफर की पूर्णता है। क्योंकि प्रेम में पड़ना आसान है, मगर उम्र भर 'साथ' बने रहना ही असली इबादत है।
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