बधानगढ़ी
एक दिवस ऐसा था भैया बैठा था उन्मुक्त धार पर शेखर से शून्य मिला था रुका समय ये जान कर। बधानगढ़ी की चोटी थी मखमली घास मोटी थी बाँझ व देवदार का झुरमुट कुमाऊँ शृंखला भी छोटी थी। शीतल हवाओं के झोंकों ने एक दिव्य संगीत बजाया था प्रकृति आनंद में नाच रही थी तन-मन व जीवन हर्षाया था । वो स्वप्न नगरी था या फिर था देवलोक स्वर्ग हिमालय पर था और हम करते थे भोग। कितने पास थे हम खुद के क्या अलौकिक एहसास था रोम-रोम स्पंदित हो रहा था संवेग करता आनंद प्रवाह था । अनजानों की पहचान हुई थी अपनत्व की नयी राह खुली थी परदेश भी अपना बन रहा था जैसे पूर्वजन्म की कुछ याद थी। मैं देवभूमि का चिर वासी बना था बद्री केदार का आशीर्वाद मिला था गढ़वाल से आज अब नाता जुड़ा था नेगी दा के गीत पहली बार सुना था।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
