दीपक से प्रार्थना
हो दीप तुम तो रखो सदा ये ख्याल, रहता सदा अन्धेरा दीप तले ही । आती है रौशनी सदा तुम्ही से, है नही भ्रांति जग को तनिक भी । पर रहना नही तुम तनिक भी भ्रांतिमान, नहीं पा सकोगे खुद जीवन उजियाली रात। जो स्नेह भरा जग तुममें है, अब तक अपरम्पार प्रिये , जलना तुम्हें उसी से है सदा अपरम्पार प्रिये । दोगे तुम उजियारा जब तक अपरम्पार प्रिये , तब तक रहोगे प्रिय से प्रिय अपरम्पार प्रिये । मांगोगे तुम जब चिनगारी भी जग से प्रिये, पावोगे पर सदा नही जो चाहोगे जग से प्रिये मिलेगी जो वो भी सम्हालकर और तनिक औरों के घर्षण, रुदन ,क्रंदन से भरपूर प्रिये । जग हंसेगा तुम रोओगे और अपरम्पार प्रिये, जलते -जलते जल जाओगे और अपरम्पार। रखना नही तनिक भी आशा - विश्वास प्रिये समझना यही तुम्हारी नियति , और अधिक क्या भार प्रिये । तुम जलना और मुदित होना, हर अपकर्ष जग का लेना , है आश लगाए जग तुमही से , नही घात -प्रतिघात करना । देना निर्मल ज्योति सदा तुम , हर लेना जग का अंधियारा ।। है यही प्रार्थना तुम से प्यारे , नही कभी अभिमान करना , नही दे सकेगा मोल तुम्हरा , मांग नही अपमान करना ।। मौलिक रचना - उमाकान्त हमराही 11/11/2025 9129877918
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