🌾 धरती का वरदान
पसीना बहता, तब उगती है फसल, मिट्टी की कोख से, यह कैसी हलचल। नन्हा-सा बीज, सोता था चुपचाप, सूरज ने छुआ तो, मिट गया संताप। बूंद-बूंद पानी, जो मेघों ने दिया, हल की रेखा ने जीवन भर लिया। किस्मत संवरती है किसान के हाथ से, तब मुस्कान आती है हर एक पात से। जब बालियाँ सुनहरी होकर झुकती हैं, तब गाँवों की साँसें सुख से रुकती हैं। यह अन्न नहीं है, यह मेहनत का मान है, यह धरती की भूख का, अमृत-गान है। हवा के झोंके में लहराता यौवन, हर दाने में छिपा है त्याग और तर्पण। फसल सिर्फ़ दाना नहीं, जीवन का आधार है, यह श्रम और सृष्टि का सुंदर उपहार है।
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