मानो कवि बड़े हैं
छंद( 8,8,8,7) अकड़ तो ऐसे मानो,कवि बहुत बड़े हैं; टाँय-टाँय करते हैं,दिखाते बहुत हैं। दूसरों को हेय बुझे,अपने को श्रेष्ठ माने; अहं तो पूछो ही मत,मानो अग्रदूत हैं। जब देखो जहां तहां,बघारते हैं शेखी ये; चतुर सयाने सिर्फ,मानो ये अद्भुत हैं। जग में भरे पड़े हैं, दिग्गज एक से एक; ऐसे कूपमंडूक जो,घमण्ड से युक्त हैं । नरेंद्र सिंह 31.03.2024
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