नहीं आउंगी...
एक दिन अचानक ... मैं चली जाऊंगी , सब कुछ छोड़ कर, बस चली जाऊंगी । तुमको , अपने सपनो को , अपनी बातों को , हर एक वादे को .... तोड़ कर .... सबकुछ छोड़ कर, मैं चली जाऊंगी । कहना चीख कर तब बेवफ़ा मुझे , कहना कि मुझे वादे निभाने नहीं आते थे, कहना कि मेरी हर सोच उलूल-जलूल थी , कहना कि मेरी सारी बातें.... बस फ़िज़ूल थी , कहना मैं कितनी नादान थी , कहना मैं नाकाम थी, मेरी कविताएं बेबुनियाद थी, हंसना कि मैं कितनी बेवकूफ़ थी, ठहाके लगाना , और कहना....अच्छा हुआ , एक और wicket down हुआ, मैं नहीं आउंगी । फिर चीख चीख कर पुकारना , पीछे नहीं , सबके सामने पुकारना , कोई फर्क नहीं पड़ेगा तब , क्योंकि.... मैं नहीं आउंगी । वापस मुड़ कर तुमसे रूबरू होने.... मैं बस .... नहीं आउंगी ।
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