बेजुबान
पर लटके बोलते हो उड़ चलो। मेरा आसमां तो सिमट गया तुम्हारे दर के आंगन में। समाज के कायदों में ढलते ढलते सपनो को इतना मरोड़ा कि उनका वजूद ही बदल गया। सही राह पर चलने में कल्पनल को बक्से में बंद का भूल गए। और जब साहस को आवाज़ देने की हिम्मत जुटाई उसका दम टूट गया।
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