बिखरा
अब सुकून ए शाम की तलब नही रही वो ख्वाब ना रहे वो हकीकत नहीं रही अब भी झुका देते हैं सजदे में अपना सर अब पहले जैसे रब की इबादत नहीं रही वो दौर और था जब खुशनुमा थे हम मुतफ़र्रिक़ को खुश रहने की आदत नहीं रही
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