नई पसंद
ये आँखों मे नमी कैसी है दिल.ए.मुज़्तर कैसी है, आज़ाद तो कर दिया हर बंधन से उसे , फिर मेरे दिल मे उसकी यादे कैसी है झुठ, फरेब पसंद ना था जिस दिल को, फरेब और झुठ का सहारा लेकर, उसे तोड़ गया नादान थे हम , ये समझ ना सके कि, अब हमे छोड़ दिया गया || तो अब ,ये तन्हाई कैसी है , ये अलग़ाओ कैसी है खुदा जाने, अब हमारे रिश्ते मे ये रुसवाई कैसी है|| आ गया है कोई और पसंद ,शायद ए मेरे दिलबर ये तो बता , तेरी नई पसंद कैसी है|| # स्वर्णाक्षी सिंह
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