राहत
कह ना सका जो लब्ज़ कभी मैं के काश उनको सुना होता तुमने तो थोड़ी राहत मिली दिल को होती जो पहले कभी मिली न थी ... के तुझ पर है बस हक मेरा ऐसा भरम क्यूँ मुझको हुआ कितनी राहत मिली दिल को होती जो यह भरम भरम न होती ... खुशियों के बदले जो ख्वाब खरीदे मेरे दिल के जैसे वो क्यूँ रहे अधूरे के थोड़ी राहत मिली दिल को होती जो ख्वाब ओ दिल अधूरी न होती ...
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