भूल हो गई
क्या बताएं इस ख़ुदा से भी यारों। यह कितनी संगीन भूल हो गई। मरने की दुआ हमनें की थी पहले। आज जीना चाहा तो क़बूल हो गई। नादानी में आईना पोछते रहे हम। और चेहरा इधर धूल-धूल हो गई। बोया था हमने चम्पा कभी जो। आज देखा वह भी बबूल हो गई। सोचते रहे लेकिन कुछ ना सुझा। लगा बत्ती दिमाग़ की ग़ुल हो गई। देखा है जब से लोगों का रोना। ज़िंदगी तब से अपनी कूल हो गई। हर रोज नया पाठ पढ़ा ही देती है। ज़िंदगी लगती जैसे स्कूल हो गई। कांटों को जब से समेटना है सीखा। तब से लगता है कि ये फूल हो गई।
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