साहेब
कभी दूर सधे निशाने पर खूब तीरंदाजी होती है, अपनी तबियत भी कभी-कभी नासाजी होती है। यही एक बात है जो साहेब को परेशान करती है, एक आये तो दूजा जाये समस्या हैरान करती है। ये कागजी बीमारी का पर्चा झट से डल जाता है, जिम्मेदारियों में फंसे हुए साहेब को खल जाता है, क्या करें हम भी तो सप्ताह से माह तक आ जाते हैं, छुट्टी भी समस्या है इसलिए ही तो ये राह अपनाते हैं। साप्ताहिक अवकाश भी तो चंद दिनों तक ही रहता है, पोस्टिंग, टीडी, कोर्स का भी अक्सर चक्कर चलता है। यही एक बात है कि साहेब हम पर नाराज रहते हैं, कभी-कभी भरी सभा में हमें वो गद्दार भी कहते हैं। हमारी दशा देखकर साहेब खूब अनुमान लगाते हैं, और अगले जन्म का हमारा किरदार भी बताते हैं। क्या करें अब खुद को ही अपना शुभचिंतक कहते हैं, इमानदारी की मूरत को जमाने में पत्थर ही लगते हैं। अगर खुद को ही संभालना हो तो कोई मलाल नहीं है, हमको अपनी बे-ख्याली का फिर कोई सवाल नहीं है। बस रह जाती है ये बात कि हमसे सिर्फ हम ही नहीं है, हमसे और भी हैं रिश्ते बंधे सिर्फ ये कमरबंद ही नहीं है। इसलिए औरों को वक्त देने के लिए करते हैं ये काम, नहीं होता जोड़ों में दर्द फिर भी करते हैं घर में आराम।
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