अधूरी मोहब्बत
भावनाओं में बहकर फ़ैसला किया, साथ तुम्हारा भी उस वक़्त लिया। कहा था—प्यार कोई छोटा शब्द नहीं, पर आज वही बात तुमको याद नहीं। माना मेरा रंग तुम्हारे सा नहीं, पर मोहब्बत का कोई मोल कहाँ कहीं। आँख मूँदकर मैंने चाहा तुम्हें, हर आदत में पाया और अपनाया तुम्हें। न कुछ बदलना, न माँगी थी आस, बस चाहा था कोई करे बेपनाह विश्वास। पर आज वही मोड़ आकर मिला, जहाँ न इकरार, न जिक्र रहा। सिर्फ़ कहा—“अब रिश्ता नहीं होगा,” और सब कुछ वहीं अधूरा छूट जाएगा। राहें जुदा, मंज़िलें अलग, दिल के सफ़र में रह गया सन्नाटा गहरा। मैंने तो एक ही मंज़िल देखी थी, तेरे संग हर मुश्किल राह सोची थी। ग़म हो या अंगारों की डगर, साथ तुम्हारा था मेरा सफ़र। पर तुमने छोड़ दिया इस राह पर मुझे, कैसे बढ़ूँ आगे, कहाँ ढूँढूँ खुद को सजे? शब्दों में ढलता है अब ये दर्द मेरा, शायद मिले जवाब कोई, या सुकून बसेरा।
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