कुछ ही हैं
इस दुनिया में लोग भले, कुछ ही हैं मुझ जैसे जो मुझे मिले, कुछ ही हैं फ़रेब ओढ़ के चलना फैशन है इस दौर का सच पहन के जो चले, कुछ ही हैं शुरू शुरू के सफ़र में हाथ बढ़ा दे कोई भी सड़क के जैसे साथ चले, कुछ ही हैं निज स्वार्थ को पीछे रखके हित सोचना औरों का जैसे कोई दिया जले, कुछ ही हैं एक बार जो छोड़ गए फ़िर कहां मिले छोड़ कर जो वहीं मिले, कुछ ही हैं उग के चढ़ना, चढ़ के जलना, सूरज सबको बनना आता है मगर शाम के जैसे जो ढले, कुछ ही हैं पहले कली से फूल बने और फिर मुरझा गए मुरझा कर जो फ़िर खिले, कुछ ही हैं
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