अधूरी राहें
मंज़िल मिली तो रास्ते छूट गए, राहें चली, क़दम पीछे छूट गए। अंजाम से डर-डर के हमने, राहों को देखा ही नहीं, और अंजाम के सपने, यूँ ही टूट गए। कुछ तो कहते थे कि रुक जाओ, कौन — अब याद नहीं, अब याद ही नहीं कौन, कब कैसे रूठ गए। चाहकर भी मुड़ सकते नहीं, अब हिम्मत नहीं, हिम्मत करने के आसय भी जैसे फूट गए।
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