कुदरत
जहां में तेरे तिनके सी औकात नहीं, तेरे बंदों में अब वैसी बात नहीं।। तपती धूप में थोड़ी सी बरसी बदली, जुर्माना है ये कोई सौगात नहीं।। सरे राह बेइज्जत कर दें, गाली दें, जिनकी कोई इज्जत कोई जात नहीं।। यार बुढ़ापा माना थोड़ा मुश्किल है, हो अपनों का साथ तो कोई बात नहीं।। गमों का ऐंसा ताना-बाना दुनिया में, बिना मरे तो मिलती यहां निजात नहीं।। तब तक समझाएगी कुदरत जब तक मैं, जान न लूं कि मेरी कोई बिसात नहीं।। रमन 12:30 दोपहर 17 मई 2025..
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