कलम मौन है
कलम मौन है हृदय द्रवित है, क्रूरता पर मैं अब क्या लिखूँ। मूक हूँ स्तब्ध हूँ इस घटना पर पहलगांव पर मैं क्या लिखूँ।। तोड़कर कायरता की सीमा, निर्दोष का रक्त दुष्ट बहाया। हद हो गयी अब नीचता की, लज्जा से वह स्वर्ग लजाया।। अगर रक्त न खौला जिसका, समझो तन में बह रहा पानी है। उबला नहीं अब जो क्रोध में, वह भला कैसा हिंदुस्तानी है।। नीचों ऑंखें खोल कर देखो, मलेच्छो ने धर्म पूछकर मारे हैं। जाति उसने नहीं पूछी किसी से, उसके निशाने पर हिन्दू सारे हैं।। नरेंद्र सिंह, 22.04.2025 शेष बाद में
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