लॉंग वॉक
मैं सोचता हूँ- हमे हमारा आर्ट कब तक बचापायेगा कब तक अपनी भावनाओं को हम कलम पर ढोते रहेंगे और मान लेंगे वो तमाम झूट जिनके सच होने का भरोसा हमारी आर्ट की तरह ही बहुत मासूम है। मैं सोचता हूँ- कब हमे लॉंग वॉक्स के दौरान बातों की ज़रूरत नही पड़ेगी और सिर्फ खामोशी से ही हम अनंत की ओर बढ़ते रहेंगे। मेरी खामोशी को यहां इंट्रोवर्टनेस ना समझे सारी बातें मेरे किरदार पहले ही कर चुके हैं। मैं सोचता हूँ- खुशी के बाद की उदासी के बारे में जो धीरे धीरे दिल और दिमाग पर मेरे आर्ट की सनक की तरह ही फैलने लगती है बिना रुकावट के, उस आईडिया की तरह जो तुम नही पर तुम्हारा ही एक रूप है मेरी कहानी में। अंत में इस बात को लेकर परेशान होता हूँ कि इंसान की चाहत कौनसी है? वो, जो कभी कभार किस्मत से उसके सामने है या वो, जिसे वै अपने दिमाग में क्रिएट करलेता है? शायद जवाब की हैसियत ना तो लेखक के पास है और ना ही बीतते हुए वक़्त के पास। लेखक सिर्फ खुद को बचाने की कोशिश करेगा क्योंकि ना तो उसकी आर्ट उसे हमेशा बचा सकती है...और ना ही तुम।
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