कुण्डलिया
शीर्षक-- परिचित परिचित हो संस्कार से, करना उत्तम काम। वही तुम्हें संसार में,रखता ऊँचा नाम।। रखता ऊँचा नाम, ढंग है जो सिखलाता। बता जगत की रीत,सही पथ सदा बताता।। इससे उत्तम भाव, हृदय में पनपे नित-नित। यही दिलाता मान, कराए जग से परिचित।। अपने से परिचित रहें, खुद को पहले नाप। सुधरें अपने आप में, झाँकें अंदर आप।। झाँके अंदर आप,हृदय की करें सफाई। करें वही जो कार्य, नहीं हो जगत-हँसाई।। करें सदा सत्कर्म, लगें कंचन सम तपने। मानवता का ख्याल, रखें दिल अंदर अपने।। परिचित जो सम्पर्क में, जानो उसका काम। असली की पहचान हो, ताकि न हो बदनाम।। ताकि न हो बदनाम,यहाँ है पग-पग धोखा। बचकर चलना राह, जगत है बहुत अनोखा।। इसको मानो सत्य, यही ग्रंथों में अभिहित। जाँचो-परखो मीत, बना जो नूतन परिचित।। नरेंद्र सिंह, 22.05.2025
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