वो तोड़ती रही पत्थर
वो तोड़ती पत्थर " अपने हाथों की नाज़ुक सी कलाइयों से , हथौड़ा उठा निरंतर प्रहार करती हुई सी वो तोड़ती रही पत्थर,अविरल बस खड़ी हुई सी । यकायक नजरें पड़ी जब उसकी अपनी उस टूटे छप्पर के मकान पर साफ दिखाई दी उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें पर वो अडिग कार्य करती रही सीना तान कर । एक और अपने मासूम बालक की भूख और पति के बीमारी की बात एक ही पल में भांप गई उसके भाग्य में लिखी मार्मिक स्याह भरी वो रात । कैसे उस रात ने उसकी बस्ती थी उजाड़ी जब आया था ,वो भयावह तूफान जिसकी अविरल गति ने कितनों की जिंदगियों की राह मोड़ी । डूबी रही वो कर्जों तले धरती पर गर मेहनत और कर्तव्य के पथ की लगन उसने नहीं कभी भी छोड़ी । अपने परिवार के खातिर आख़िर दम तक वो लड़ती रही हां वो तोड़ती रही पत्थर, आख़िर गरीबी उसकी राह को जकड़ी रही । #स्वाति की कलम से ✍️
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