अब अकेलापन अच्छा लगता है
अब अकेलापन अच्छा लगता है, ना कोई सवाल करता है, ना कोई जवाब देने की मजबूरी होती है। बस मैं होता हूँ… और मेरी खामोशी। कभी डर लगता था इस तन्हाई से, अब ये मेरी सबसे वफ़ादार साथी बन गई है। कम से कम ये तो बीच रास्ते छोड़ कर नहीं जाती। अब फोन कम बजता है, और दिल भी कम धड़कता है। किसी के मैसेज का इंतज़ार नहीं रहता, ना ही किसी की “Seen” पर अब फर्क पड़ता है। अब समझ आ गया है — हर रिश्ता जरूरी नहीं होता, और हर अपना… हमेशा अपना नहीं रहता। अब किताबें अच्छी लगती हैं, बारिश में चाय, खुद से बातें… और कभी-कभी खुद से लड़ जाना। अब अकेलापन अच्छा लगता है, क्योंकि भीड़ में सबसे ज़्यादा खो गया था मैं। अब खुद के पास हूँ, तो अधूरा होकर भी… थोड़ा पूरा लगता हूँ।
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