प्रेम
भीड़ खड़ी है बाजारों में, हर चेहरा मुस्कुराता है कोई गीत लिखता विरह का, कोई मिलन के गुण गाता है l नदी के दो किनारों सा, यहाँ हर शख्स बहता है , दावा है सबका वफ़ा का, हर कोई 'प्रेमी' कहता है। पर गौर से देखो गर दुनिया, तो सच कुछ और ही होता है, सब प्रेम में होते हैं बेशक, पर सब में प्रेम नहीं होता। कोई रूप के आकर्षण में, बस प्यास बुझाने आया है, कोई तन की सुन्दर मूरत को, ही प्रेम समझ कर लाया है। किसी को जरूरत है साथ की, तो किसी को बस सहारा चाहिए, मजधार में अटकी कश्ती को, बस एक किनारा चाहिए। जहाँ स्वार्थ की बुनियाद खड़ी, वहां त्याग कहाँ फिर होता है? सब प्रेम में होते हैं बेशक, पर सब में प्रेम नहीं होता। वो 'पा लेने' की जिद नहीं, वो 'हो जाने' का नाम है, वो सुकुन भरी इक सुबह है, वो ढलती हुई इक शाम है। जो खुद को खोकर पा ले सब, वही इस बीज को बोता है, सब प्रेम में होते हैं बेशक, पर सब में प्रेम नहीं होता। अक्सर लोग कहते हैं, "मुझे तुमसे प्यार है, गौर से देखो तो इसमें, "मुझे" ही सबसे सवार है। जब 'मैं' मिटे और 'तुम' बचे, या 'दोनों' मिलकर 'एक' हों, तभी समझना जीवन में, तुम्हारे भाव नेक हों। बिना प्रेम के हृदय , बस एक खाली कोना है, सब प्रेम में होते हैं दुनिया में, पर सब में प्रेम नहीं होता।
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