‘भटकता राही’
शाम का सूरज ढलता है, अंधकार का पहरा बढ़ता है, निज गांव की लंबी गलियों में, खामोशी दस्तक देती है, ये सोच के राही ठहर गया, ये सोच के राही सहम गया, मैं क्यों अपनों से दूर चला।।02 उम्मीद का कंबल बाहों में, बैठा अंबर की छत्रछाया में, संकोच की सीमा बढ़ती है, जब महफिल तारों की सजती है, राही अपनों से बिछड़ गया, अब मिट्टी से ही लिपट गया, मैं क्यों अपनों से दूर चला।।02 उस पार की दुनिया भाती है, ख्वाबों में चलता जाता है, अंजान रहा वो खुद से ही, बहक गया क्यों औरों से, मतलब की दुनिया खत्म हुई, झूठी परछाई का पर्दाफाश हुआ, वो राहों में बिखर गया, अब मंजिल से ही मुकर गया, मैं क्यों अपनों से दूर चला।।02 अब डर लगता है सपनों से, कहीं टूट न जाए अपनों से, मैं सहज खड़ा प्रतिशोध के अंगारों पर, बढ़ती प्रतिस्पर्धा हर क्षण मंजिल की राहों पर, राही विचलित,राही भ्रमित अब निस्तब खड़ा, मैं क्या पालूंगा,खोकर अपनी माटी को, मैं क्यों अपनों से दूर चला।।02 कवि–राजू गुजराती
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