जब शहर हमारा सोता है
जब शहर हमारा सोता है, जब रात तुम्हारा रोता है। बीते दिन याद आते है सुनहरे पल धुंध में गुम जाते है। तुम्हारी तरंगे जब उबाल मारती हैं, तुम्हारे ललकार कर नींद से तुम्हे जगाती है क्या सचमुच शहर हमारा सोता है या सब चीखते है अपने बंद कमरो मे अपने मासुका को याद करके, वो जगमगाता झिंगुर ऊँचे आसमां मे, अकेला है क्या वो पूछो तो तुम उससे। गर शहर हमारा सोता है तो भट्टी पे कौन है वो जो आड़ लगाए दीवाल पर सर रख रोता है। "एक और बनादो" ये सोचकर वो कहता है, शायद मासुका उसकी उसको आकर एक चुंबन दे दे, अरे पागल ऐसा थोडी होता है। क्योंकि शहर और मासुका तो रात को सोता है।। याद आये हुए पलो की कीमत क्या है? उस मंज़र में खड़े लोग भूल चुके होंगे क्या तुम्हे, याद ही याद मे वो चार सीग्रेट पी चुका होता है शायद याद करते हो तुम्हे वो जब जाम मेहफिल में खुलता हो, या सोते सपनो मे, चमचमाती सितारों के नीचे बैठे जब हवा उन्हे छु जाता हो || पर क्या फर्क पड़ता है, याद ना भी करते हो तो तुम भी सो जाओ, रोते रोते वो भी शहर के साथ जाता है सो, तुम आधी रात में गम में सोते हो, वो गम से भरे हुए ही थककर जाते है सो ।। बेहतर यही है बिना यादों का छल्ला बनाये तुम भी सो जाओ इस शहर के गोद मे ।। अब शहर सो चुका, गम अब धुंधली रातों में खो चुका अब शहर सो चुका........ (कल्पना)
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