तब भी… सिर्फ़ तुम्हारा रहूंगा
एक दिन… कभी यूँ ही, जब फुर्सत से सोचोगी… जब पास सब होगा पर फिर भी कुछ अधूरा लगेगा… तो शायद याद आएगा — वो साधारण सा चेहरा मेरा, जो हर भीड़ में भी सिर्फ़ तुम्हें ही देखा करता था। वो हल्की सी हँसी, जो तुम्हारी एक मुस्कान से जुड़ी थी… और वो बेमतलब की बहसें — जिनमें छुपी होती थी तुम्हें खो देने की अनकही घबराहट। हर रोज़ की वो बेसिर-पैर की बातें, जो कभी बोझ लगी होंगी तुम्हें, अब शायद उन लफ़्ज़ों में तुम मेरा सच्चा साथ ढूँढोगी… शायद तब समझ पाओगी— मैं कितना कुछ कहता था, बिना कुछ कहे… हर बात में, तुम्हारी परवाह लिपटी होती थी। तुम्हारे ग़ुस्से में भी, चुपचाप ख़ुद को दोष देता था — वो मैं था........ जो हर खामोशी में तुम्हारी साँसों की आवाज़ ढूँढता था — वो भी ...... मैं ही था। कभी लग सकता है तुम्हें — कि सब बीत गया, मगर जान लेना... कुछ एहसास कभी वक़्त की गिरफ़्त में नहीं आते। मैं अब भी वहीं हूँ… शायद थोड़ा दूर… शायद थोड़ा ख़ामोश… पर हर पल, हर दुआ में तुम्हारे ही नाम से जीता हूँ। क्योंकि... प्यार, सिर्फ़ पाया नहीं जाता… कभी-कभी, चुपचाप निभाया भी जाता है। मैं तब भी तुम्हारा था, अब भी हूँ… और जब ये दुनिया थम जाएगी — मैं तब भी… सिर्फ़ तुम्हारा ही रहूँगा। - Jeeshabh Bharti (Inksmith)
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